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EOU में अमित कुमार जैन की पोस्टिंग से फिर गरमाया सृजन घोटाला, सात साल पुराने मामले की हो रही चर्चा

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बिहार में आईपीएस अधिकारियों के बड़े तबादले के बाद अमित कुमार जैन को आर्थिक अपराध इकाई (EOU) में अपर पुलिस महानिदेशक की जिम्मेदारी दी गई है। उनकी नई पोस्टिंग के साथ सात साल पुराने सृजन घोटाले का मामला फिर चर्चा में आ गया है।

पटना/आलम की खबर:बिहार में हाल ही में हुए बड़े प्रशासनिक फेरबदल के बाद कई आईपीएस अधिकारियों की नई तैनाती चर्चा का विषय बनी हुई है। इसी क्रम में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी अमित कुमार जैन को आर्थिक अपराध इकाई (EOU) में अपर पुलिस महानिदेशक की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। उनकी नई पोस्टिंग के साथ ही सात साल पुराने चर्चित सृजन घोटाले का मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

गृह विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार अमित कुमार जैन को आर्थिक अपराध इकाई में अहम भूमिका दी गई है। यह वही एजेंसी है जो राज्य में आर्थिक अपराध, भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितता और बड़े घोटालों की जांच करती है। ऐसे में उनकी नियुक्ति को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विपक्षी दलों से लेकर सोशल मीडिया तक लोग पुराने मामलों को याद कर सवाल उठा रहे हैं।

दरअसल, वर्ष 2017 में सामने आए बिहार के बहुचर्चित सृजन घोटाले ने पूरे राज्य की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था को हिला दिया था। इस घोटाले में सरकारी राशि के बड़े पैमाने पर गबन और अवैध वित्तीय लेनदेन के आरोप लगे थे। जांच एजेंसियों की पड़ताल और मीडिया रिपोर्ट्स के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया था।

इसी दौरान एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सृजन संस्था से जुड़े खातों से आईपीएस अधिकारी अमित कुमार जैन और उनके एक रिश्तेदार के खाते में धनराशि ट्रांसफर की गई थी। रिपोर्ट में जांच दस्तावेजों और बैंक ट्रांजैक्शन का हवाला देते हुए कहा गया था कि अप्रैल 2017 में दो अलग-अलग आरटीजीएस ट्रांजैक्शन के जरिए उनके खाते में लाखों रुपये भेजे गए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक 11 अप्रैल 2017 को छह लाख रुपये और अगले दिन नौ लाख रुपये उनके खाते में ट्रांसफर किए गए थे। इसके अलावा उनके एक रिश्तेदार के खाते में भी बड़ी रकम भेजे जाने का दावा किया गया था। इस पूरे मामले को लेकर उस समय बिहार की राजनीति में काफी हलचल मची थी और विपक्ष ने सरकार एवं प्रशासन पर कई सवाल खड़े किए थे।

हालांकि उस समय अमित कुमार जैन ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया था। उन्होंने कहा था कि उनके खाते में आई रकम निजी और वैध वित्तीय लेनदेन का हिस्सा थी तथा उसका सृजन घोटाले से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने जांच एजेंसियों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई थी और उनके खिलाफ किसी प्रकार की अवैध गतिविधि साबित नहीं हुई।

उस समय सामने आए एक बातचीत के अंश में भी अमित कुमार जैन ने मीडिया रिपोर्ट में किए गए दावों को गलत बताया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें किसी अवैध लेनदेन की जानकारी नहीं है और उनके खिलाफ लगाए जा रहे आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। इसके बावजूद यह मामला लंबे समय तक मीडिया और राजनीतिक बहस का हिस्सा बना रहा।

अब जब बिहार सरकार ने उन्हें आर्थिक अपराध इकाई जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विभाग में तैनात किया है, तो सृजन घोटाले का पुराना मामला फिर चर्चा में लौट आया है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली एजेंसी में ऐसी पोस्टिंग स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान आकर्षित करेगी, खासकर तब जब अधिकारी का नाम पहले किसी चर्चित विवाद से जुड़ चुका हो।

सोशल मीडिया पर भी इस नियुक्ति को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोग सरकार के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है तो केवल पुराने विवादों के आधार पर उनकी प्रशासनिक जिम्मेदारियों पर सवाल उठाना उचित नहीं माना जा सकता।

प्रशासनिक हलकों में इस तबादले को सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि राज्य सरकार समय-समय पर प्रशासनिक जरूरतों और अनुभव के आधार पर अधिकारियों की नई पोस्टिंग करती रहती है। हालांकि राजनीतिक स्तर पर इस मामले को लेकर बयानबाजी शुरू होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा रहा है।

सृजन घोटाला बिहार के सबसे चर्चित आर्थिक घोटालों में गिना जाता है। इस मामले में करोड़ों रुपये के गबन का आरोप लगा था और इसकी जांच कई एजेंसियों द्वारा की गई थी। वर्षों बाद भी यह मामला बिहार की राजनीति में समय-समय पर चर्चा में आता रहता है। ऐसे में अमित कुमार जैन की नई जिम्मेदारी ने इस पुराने विवाद को फिर से सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना दिया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में विपक्ष इस मुद्दे को और जोर-शोर से उठा सकता है। वहीं सरकार की ओर से अब तक इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन यह साफ है कि आर्थिक अपराध इकाई में उनकी नियुक्ति ने प्रशासनिक हलकों के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ा दी है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बड़े प्रशासनिक पदों पर नियुक्ति के समय पुराने विवादों और सार्वजनिक धारणा को किस हद तक महत्व दिया जाना चाहिए। फिलहाल बिहार की राजनीति में यह मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है और आने वाले दिनों में इस पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।

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